डीएनए/भास्कर नेटवर Saturday, July 18, 2009 10:34 [IST]
जनसंख्या बम और जनसंख्या विस्फोट जैसे मुहावरों पर 1960 और ९७क् के दशक में बहस हुआ करती थी। फिर 1975 में इमरजेंसी आई जिसमें जबर्दस्ती नसबंदियां की गईं। में कुछ जनांकिकी विशेषज्ञों ने बताया कि आबादी में स्थिरता आ रही है और धीरे-धीरे भारत मंे भी जनसंख्या स्थिर हो जाएगी। इसके एक दशक बाद हम अधिक आबादी से मिलने वाले लाभों की चर्चा करने लगे। माना गया कि हमारी अधिक जनसंख्या हमारे लिए संपदा है। वह अधिक उत्पादन करेगी और इससे भी महत्वपूर्ण अधिक खरीदी भी करेगी। लेकिन अब फिर से बढ़ती आबादी पर चिंता जताई जाने लगी है। शायद यही वजह है कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नबी चाहते हैं कि टीवी पर देर रात तक बेहतरीन कार्यक्रम दिखाए जाएं ताकि लोगों की ऊर्जा कहीं और खर्च हो। कुल मिलाकर उनका जोर जनसंख्या नियंत्रण पर है लेकिन मंत्री को ऐसे हास्यास्पद सुझाव देने के बजाय उन राज्यों के रिकॉर्ड पर विचार करना चाहिए जहां प्रति परिवार दो बच्चों के लक्ष्य को की सीमा से पहले ही हासिल करने मंे सफलता मिली है। इनमें महाराष्ट्र और दक्षिण भारतीय राज्य शामिल हैं। ऐसा शिक्षा के प्रचार-प्रसार और स्वास्थ्य सुविधाओं की लोगों तक पहुंच सुनिश्चित करने की वजह से हो पाया है। उत्तरी राज्यों में ऐसा नहीं हो पा रहा है इसलिए बेहतर तो यह होगा कि आर्थिक विकास के जरिए लोगों का जीवन स्तर बढ़ाया जाए और अधिक आबादी के असर के बारे में उन्हें खुद विचार करने दिया जाए।
Tuesday, July 21, 2009
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