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Thursday, July 16, 2009

पेडों की कटाई से कई प्रजातियों को खतरा



पेडों की बेलगाम कटाई पृथ्वी पर विभिन्न जानवरों और पक्षियों के अस्तित्व को संकट में डाल रही है। यदि पेडों की कटाई पर तुरंत रोक नहीं लगाई गई, तो आने वाले समय में हम बहुत से पशु-पक्षियों को देखने से वंचित हो सकते हैं। जलवायु परिवर्तन को लेकर वैश्विक सम्मेलन में भी चिंता जाहिर की गई है।

हाल ही आयोजित यूएन फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) के वैश्विक शिखर सम्मेलन में जलवायु परिवर्तन की समस्या से निपटने के लिए सामूहिक कारगर कदम उठाए जाने पर जोर दिया गया। यदि इस समस्या से निपटने के लिए जरूरी संसाधन जुटा लिया गया तो संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के वल्र्ड कंजर्वेशन मॉनिटरिंग सेंटर (डब्ल्यूसीएमसी) द्वारा विकसित कार्बन एंड बायोडायवर्सिटी डेमंस्ट्रेशन एटलस पर अमल करने में आसानी होगी।

संयुक्त राष्ट्र के अपर महासचिव और यूनेप के कार्यकारी निदेशक एकिम स्टीनर ने कहा, ""इस वैश्विक आर्थिक संकट के दौर में एक-एक डालर या यूरो या फिर रूपए का इस्तेमाल इस तरह किया जाना चाहिए कि हमें पहले से दोगुना नतीजा मिले। यूनेप प्रवक्ता निक नुटल ने कहा कि शोध से हमें पता चला है कि जहां भी वनों का विनाश हो रहा है, वहां जलवायु परिवर्तन की समस्या के गहराने और जीव प्रजातियों का अस्तित्व मिटने का खतरा बढ रहा है।

प्रदूषण से बढ़ रहा है ह्वदय रोगों का खतरा



पर्यावरण प्रदूषण के कारण जलवायु में आए अवांछनीय परिवर्तनों के परिणाम आज कई रूपों में हमारे सामने हैं। ग्लोबल वार्मिग जैसी गंभीर समस्या पृथ्वी के असतित्व के लिए सबसे गंभीर संकट है। इसके बाद भी प्रदूषण के कारण जन्मी समस्याएं खत्म नहीं हुई हैं। रोज एक नई समस्याएं हमारे सामने आ रही हैं। प्रदूषण अब स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हो रहा है। हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ केलीफोर्निया में हुए एक अघ्यन में पाया गया है कि प्रदूषण के कारण लोगों में ह्वदय रोगों का खतरा बढ़ गया है।

विश्वविद्यालय के जीनोम बायलॉजी जर्नल की इंटरनेट पर प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वाहनों से निकले घँूए के कारण वातावरण मौजूद कार्बन कणोे के शरीर में पहुँचने से ह्वदय रोगों के साथ रक्त में कोलेस्ट्रॉल लेवल भी बढ़ जाता है। वातावरण में मौजूद ये कार्बन कण कोलेस्ट्राल के साथ मिलकर उन जीनों को सक्रिय कर देते हैं जो रक्तवाहिनियों को तेजी से कड़ा कर देती हैं। इसके अतिरिक्त वाहनों ओर फैक्टि्रयों के कारण फैले इस प्रदूषण के कारण लोगों में लंग कैंसर, हार्ट अटैक का खतरा भी बढ़ गया है।

रिपोर्ट में प्रकाशित विस्तृत कारणों में बताया गया है कि वातावरण में मौजूद जले हुए डीजल के ये कण शरीर में सांस के द्वारा फेंफड़ों में प्रवेश करते हैं। ये कण यहाँ से वसा से क्रिया करके रक्तवाहीनियों पर हानिकारक प्रभाव डालते हैं। फेंफड़ो में इन कणों के पहुँचने से अस्थमा अटैक, लंग कैंसर, के साथ डीएनए डेमेज होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

अंटार्कटिका में ओजोन परत के लिए नए खतरे



लंदन । हाल ही में ईस्ट एंजेलिया यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए एक शोघ और बि्रटिश अंटार्कटिक सर्वे में इस बात का खुलासा किया गया है कि अंटार्कटिका महाद्वीप के वातावरण में भारी मात्रा में ऎसे रसायनों मौजूद हैं जो ओजोन परत का हा्रास कर रहे हैं। वातावरण रसायन वैज्ञानिकों ने लगातार 18 महीनों तक इसका अघ्ययन करने के बाद यह रिपोर्ट पेश की है। मई से लेकर अगस्त के बीच सूर्य के प्रकाश में यह शोघ अंटार्कटिक महाद्वीप में तेजी से पिघलती बर्फ की चट्टानों पर किए गए।

इस शोघ में जो बात सबसे महत्वपूर्ण है वो यह कि अंटार्कटिक क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में आयोडीन आक्साइड मौजूद है जो इससे पहले कभी यहाँ नहीं पाया गया था। इसके अलावा ओजोन परत के क्षरण के लिए जिम्मेदार अन्य हेलोजल रसायन ब्रोमाइड के आक्साइड भी यहाँ पाए गए हैं।

शोघ के अगले चरण में वैज्ञानिक इन रसायनों के वातावरण पर पड़ने वाले प्रभावों का अƒयन कर रहे हैं। शीघ्र ही वैज्ञानिकों का एक दल सेटेलाइट के द्वारा महाद्वीप पर ब्रोमीन आयोडाइड के बिखरे होने की जांच करेगा। इसके साथ ही वातावरण पर पड़ रहे इसके प्रभावों का भी अघ्यन किया जाएगा।

लीड्स यूनिवर्सिटी के पर्यावरण रसायन विषय के प्रोफेसर जॉन लेन के अनुसार इन हेलोजनस के कारण पर्यावरण पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है और इस घटना का सीघा संबंद्ध मौसम में हो रहे अवांछनीय परिर्वतनों से है। वे शीघ्र ही एक विस्तृत शोघ की रूपरेखा तैयार करने की योजना बना रहे हैं जिसमें इन रसायनों को यहाँ से हटाने का हल निकालने की कोशिश की जाएगी।

सबसे बड़ा ओजोन छिद्र


पराबैंगनी किरणों से धरती को सुरक्षा प्रदान करने वाली ओजोन परत में हुए छेद के आकार के दिनों—दिन बढ़ने से पर्यावरणविद् खासे चिंतित नजर आ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार दक्षिणी ध्रुव के अंटार्कटिका के ऊपर अब तक का सबसे बड़ा छिद्र बन गया है। इसका आकार 2007 की तुलना में इस वर्ष काफी बढ़ गया है।

सयुंक्त राष्ट्र विश्व मौसम विभाग डब्ल्यूएमओ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती को पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा प्रदान कर त्वचा कैंसर से बचाने वाली ओजोन परत के होल का आकार आने वाले कुछ सप्ताहों में और भी बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक अंटार्कटिक क्षेत्र में प्रति वर्ष ओजोन परत में विशाल छिद्र दिखाई पड़ता है जो आकार में कभी-कभी उत्तरी अमरीका जितना बड़ा हो जाता है। डब्ल्यूएमओ के मुताबिक धरती का सुरक्षा कवच कही जाने वाली इस परत में इस वर्ष 13 सितम्बर तक इस छिद्र का आकार 27 लाख वर्ग किलोमीटर पहुंच गया था।

सुरक्षा कवच में सेंध :

प्रकृति से छेड़छाड़ होने पर प्रतिकूल हालात जन्म लेते हैं। रेफ्रिजरेटर का क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी, जीवाश्म ईघन के जलने और निवर्तनीकरण से उत्पन्न कार्बनडाईऑक्साइड का संकेंद्रण, घान की खेती और जीव-जन्तु के मल-मूत्र से उत्पन्न मीथेन गैस के साथ-साथ कृषि कार्यो में नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग ओजोन परत के लिए खतरनाक साबित होता है।

औद्योगीकरण की तेज रफ्तार, प्रदूषण का बढ़ता स्तर और वनों के विनाश से भी सुरक्षा कवच कमजोर हुआ है। ऊर्जा संयंत्रों तथा मोटर वाहनों से वायुमंडल में उत्सर्जित नाइट्रोजनडाई ऑक्साइड भी ओजोन परत को तोड़ती है। ग्रीन हाऊस गैस और ग्लोबल वार्मिग के चलते भी ओजोन परत प्रभावित हुई है।

कवच कमजोर होने का प्रभाव :

ओजोन परत के कमजोर होने से सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणें धरती पर खतरनाक असर छोड़ रही हैं। इससे त्वचा कैंसर जैसी घातक बीमारियों के साथ-साथ दमा का खतरा भी बढ़ गया है। पर्यावरणीय असंतुलन से मौसम का मिजाज बदला है। इसके चलते ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है। समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। जल-थल में कई जातियाँ या तो गायब हो गई हैं या गायब होने की कगार पर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षो में जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहे हैं उतना तेजी से पिछले 10 हजार वर्षो में कभी नहीं हुआ। यही हाल रहा तो सन 2050 तक दुनिया का तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा।

जलवायु परिवर्तन से संक्रामक रोगों के मिजाज में भी बदलाव आया है। भारी बारिश, बाढ़, तूफान जैसे प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं। उष्ण कटिबंघीय क्षेत्र में तापमान बढ़ने से वर्षा के स्तर में भारी बदलाव के कारण खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी आ सकती है। इसका नतीजा कुपोषण व खाद्य असुरक्षा का प्रसार हो सकता है।

प्रजातियों को बसाने की तैयारी



एडिनबर्ग। स्कॉटलैंड के जंगलों से लुप्त हो चुके जंगली सूअर, वन बिलाव और बड़ी बिçल्लयों जैसी कई दुर्लभ वन्य प्रजातियों को फिर से बसाने की तैयारी कर ली गई है। संरक्षणवादियों का मानना है कि जंगलों से धीरे—धीरे लुप्त हो रही वन्य प्रजातियों की वजह से पर्यावरण असंतुलित हो रहा है। लुप्त वन्य प्रजातियों को पुन: जंगलों में लाए जाने को लेकर हुई चर्चा में संरक्षणवादियों ने बताया जंगली सूअर, वन बिलाव, जंगली बिल्ली और विभिन्न प्रकार के पक्षियों को यहां के जंगलों में फिर से बसाया जाएगा।

पर्यावरण अभियान समूह के सदस्य दान पुलपेट्ट ने बताया कि ये प्रजातियां पारिस्थितिकीय प्रणालियों को बेहतर बनाने में मददगार साबित होंगी। साथ ही इनसे सांस्कृतिक और आर्थिक लाभ भी होगा। स्विट्जरलैंड और जर्मनी में जंगली सूअर को दोबारा लाए जाने से वहां के पर्यटन को जबर्दस्त बढ़ावा मिला है। पुलपेट्टे ने बताया कि लुप्त हो चुकीं बारह सिंगा और सूअर की कई प्रजातियों को पहले भी यहां के जंगलों में लाया गया था। वे यहां आराम से रह रही हैं। अब वन्य जीवों की संख्या तेजी से बढ़ेगी।

कमजोर होती ओजोन



स्वीडिश मेट्रोलॉजिकल इंस्टीट्यूट (एसएमएचआई) के रिसर्चर्स का कहना है कि पिछले दशकों के तुलना में इस बार फरवरी में स्वीडन के पास ओजोन परत बहुत पतली हो गई है। रिसर्चर्स का कहना है कि पिछले एक साल में दूसरी बार ओजोन परत की मोटाई इस तरह घटी है। ओजोन परत की मोटाई को नापने का यह काम स्टॉकहोम के दक्षिण में स्थित नॉरकोयपिंग के एसएमएचआई स्टेशन पर किया गया।

यहां ओजोन परत को मापने का काम 1988 से शुरू किया गया था। पिछले माह फरवरी में इस परत के सबसे पतले रूप में सामने आने की बात पता चली। स्वीडन के विंडेन स्टेशन पर एक मापन प्रक्रिया 1991 में शुरू हुई थी। उस समय यह परत सबसे हाई पोजिशन 437 डॉनसन यूनिट पर रिकॉर्ड की गई थी। एसएमएचआई के एक स्टेटमेंट में यह बात सामने आई है कि 1951 से 1966 के दौरान हुए मापन में ओजोन परत अपने सबसे मोटे स्तर पर थी। जबकि इससे तुलना करें तो अब हालात बदतर हो गए हैं। रिसर्चर्स के मुताबिक यह बड़े खतरे की घंटी है।

ग्लोबल वॉर्मिंग का पहला शिकार हिमालय


नई दिल्ली। हाल ही में हुए एक अघ्ययन में यह बात सामने आई है कि हिमालय के ग्लेशियर ग्लोबल वॉर्मिंग से सबसे पहले प्रभावित हुए थे। रिसर्चर्स उत्तराखंड में स्थित धार्मिक स्थल केदारनाथ के चोराबारी ग्लेशियर का अघ्ययन करने के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। अघ्ययन से पता चला है कि क्लाइमेट चेंज के कारण हिमालय के ग्लेशियर्स 18वीं शताब्दी के मघ्य में ही पिघलने शुरू हो गए थे। यह अघ्ययन "करेंट साइंस" में प्रकाशित हुआ है। वाडिया इंस्टिट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी के रवीन्द्र कुमार चौजर ने ये अघ्ययन किया है।

"भीख" मांगने के लिए पाक में विभाग

इस्लामाबाद। आर्थिक रूप से तबाह हो चुका पाकिस्तान अब "भीख" मांगने के लिए अन्तरराष्ट्रीय अभियान चलाने पर विचार कर रहा है। इसके तहत बाकायदा एक विभाग बनाया जा रहा है। वैसे दुनियाभर से आर्थिक मदद इकट्ठा करने की इस मुहिम को राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने आर्थिक कूटनीति का नाम दिया है।

पिछले दिन एक बैठक में जरदारी ने आर्थिक कूटनीति शाखा स्थापित करने की सलाह दी। दरअसल तालिबान के खिलाफ अभियान में हुए नुकसान की भरपाई और विस्थापितों की मदद के लिए टोक्यो सम्मेलन में अमरीका और जापान दोनों ने एक-एक अरब डॉलर की सहायता देने का वायदा किया था। सऊदी अरब, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और तुर्की ने भी लाखों डॉलर देने का वादा किया था। पाकिस्तान मदद का यह पैसा हासिल करने की कोशिश में जुटा हुआ है।

मैंग्रूव पर निर्भर प्रजातियां खतरे में


जैव विविधता पर हो रहे वैश्विक संकट से जुड़ी खबरें अक्सर हमारे लिए चिंता का सबब बनती हैं। हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलेंड के डेविड ए लूथर और स्मिथसोनियन माइग्रेटरी बर्ड सेंटर के रसेल ग्रीनबर्ग ने एक अघ्ययन में पाया है कि "मैंग्रूव" ईको-सिस्टम पर अपने जीवन निर्वाह के लिए निर्भर रहने वाली जीव-जंतुओं की बड़ी संख्या वैश्विक स्तर पर विलुप्ति के संकट का सामना कर रही हैं। गौरतलब है कि अपेक्षाकृत गर्म क्षेत्रों में कोस्टल एरियाज के आस-पास इन वन क्षेत्रों का विस्तार पाया जाता है।

स्टडी के अनुसार समुद्र तटों के फैलाव के साथ ही समुद्र स्तर में परिवर्तन और प्रदूषण से इन मैंग्रूव वनों का विस्तार दिनों-दिन सीमित हो रहा है और इससे इस हैबिटेट में रहने वाली एंफीबियंस, रेप्टाइल्स, मैमल्स और बड्र्स की प्रजातियों के लिए खतरा पैदा हो रहा है।

खतरे में अंटार्कटिक का अस्तित्व



वाशिंगटन। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता के मौजूदा स्तर में थोड़ी सी भी वृद्धि अंटार्कटिक की बर्फ चादर की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।

"नेचर जर्नल" में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार एक अंतरराष्ट्रीय दल ने अपने अघ्ययन में पाया कि पिछली बार अंटार्कटिक में कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता का स्तर वर्तमान स्तर से बहुत अधिक था और उस समय बर्फ की चादर का एक विशाल हिस्सा पिघल गया था। उन्होंने अंटार्कटिक जियोलाजिकल ड्रिलिंग अनुसंधान के तहत पहली परियोजना के दौरान समुद्र सतह के नीचे "रास आइस शेल्फ" से 1280 मीटर लम्बी परत के परीक्षण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। अनुसंधान में न्यूजीलैंड, इटली, अमरीका और जर्मनी के 50 से अधिक वैज्ञानिकों ने भाग लिया और अघ्ययन का उद्देश्य पर्यावरण के कार्बन-डाइऑक्साइड सान्द्रण महासागरीय तापमान समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी और पृथ्वी की कक्षा में प्राकृतिक चक्र से सम्बन्धित पूर्व के अघ्ययन निष्कर्ष में सुधार करना था। अनुसंधान दल के प्रमुख और वेलिंगटन स्थित विक्टोरिया विश्वविद्यालय में अंटार्कटिक अनुसन्धान केन्द्र के प्रोफेसर टिम नैश के अनुसार चट्टान और अवसादी परत से महत्वपूर्ण सूचना मिली है।

ऎसा लगता है कि अपने अक्ष पर पृथ्वी के झुकाव में बदलाव ने अंटार्कटिक महासागर की ऊष्मीयता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे पश्चिम अंटार्कटिक की बर्फ की चादर के विकास चक्र में 30 लाख से 50 लाख साल पहले बदलाव आए थे।

2035 तक लुप्त हो सकते हैं ग्लेशियर



अमरीका के प्रभावशाली सीनेटर जान केरी ने कहा है कि आतंकवाद से जूझ रहे दक्षिण एशिया में लगातार हिमालय के ग्लेशियर पिघल रहे हैं और विश्व समुदाय के नेता इस पर घ्यान नहीं दे रहे हैं। जलवायु परिवर्तन पर दिए अपने भाषण में सीनेट के विदेशी सम्बंध समिति के अघ्यक्ष केरी ने चेतावनी देते हुए कहा कि चीन से अफगानिस्तान तक के करोड़ों लोगों को पानी देने वाले हिमालय ग्लेशियर 2035 तक विलुप्त हो सकते हैं।

भारत की नदियां न सिर्फ उसके कृषि के लिए उपयुक्त हैं, बल्कि धार्मिक तौर पर भी उनका महत्व है। वहीं पाकिस्तान पूरी तरह से सूखे से बचने के लिए सिंचाई पर निर्भर है। केरी ने दुनियाभर में कुछ जगहों पर हो रहे गम्भीर मौसम परिवर्तन को विश्व के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि दक्षिण एशिया में आतंक और जलवायु परिवर्तन जैसे खतरे का गठजोड़ हो गया है।