
पराबैंगनी किरणों से धरती को सुरक्षा प्रदान करने वाली ओजोन परत में हुए छेद के आकार के दिनों—दिन बढ़ने से पर्यावरणविद् खासे चिंतित नजर आ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार दक्षिणी ध्रुव के अंटार्कटिका के ऊपर अब तक का सबसे बड़ा छिद्र बन गया है। इसका आकार 2007 की तुलना में इस वर्ष काफी बढ़ गया है।
सयुंक्त राष्ट्र विश्व मौसम विभाग डब्ल्यूएमओ द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती को पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा प्रदान कर त्वचा कैंसर से बचाने वाली ओजोन परत के होल का आकार आने वाले कुछ सप्ताहों में और भी बढ़ जाएगा। रिपोर्ट के मुताबिक अंटार्कटिक क्षेत्र में प्रति वर्ष ओजोन परत में विशाल छिद्र दिखाई पड़ता है जो आकार में कभी-कभी उत्तरी अमरीका जितना बड़ा हो जाता है। डब्ल्यूएमओ के मुताबिक धरती का सुरक्षा कवच कही जाने वाली इस परत में इस वर्ष 13 सितम्बर तक इस छिद्र का आकार 27 लाख वर्ग किलोमीटर पहुंच गया था।
सुरक्षा कवच में सेंध :
प्रकृति से छेड़छाड़ होने पर प्रतिकूल हालात जन्म लेते हैं। रेफ्रिजरेटर का क्लोरोफ्लोरोकार्बन यानी सीएफसी, जीवाश्म ईघन के जलने और निवर्तनीकरण से उत्पन्न कार्बनडाईऑक्साइड का संकेंद्रण, घान की खेती और जीव-जन्तु के मल-मूत्र से उत्पन्न मीथेन गैस के साथ-साथ कृषि कार्यो में नाइट्रोजन उर्वरक का प्रयोग ओजोन परत के लिए खतरनाक साबित होता है।
औद्योगीकरण की तेज रफ्तार, प्रदूषण का बढ़ता स्तर और वनों के विनाश से भी सुरक्षा कवच कमजोर हुआ है। ऊर्जा संयंत्रों तथा मोटर वाहनों से वायुमंडल में उत्सर्जित नाइट्रोजनडाई ऑक्साइड भी ओजोन परत को तोड़ती है। ग्रीन हाऊस गैस और ग्लोबल वार्मिग के चलते भी ओजोन परत प्रभावित हुई है।
कवच कमजोर होने का प्रभाव :
ओजोन परत के कमजोर होने से सूर्य से निकलने वाली पराबैंगनी किरणें धरती पर खतरनाक असर छोड़ रही हैं। इससे त्वचा कैंसर जैसी घातक बीमारियों के साथ-साथ दमा का खतरा भी बढ़ गया है। पर्यावरणीय असंतुलन से मौसम का मिजाज बदला है। इसके चलते ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है। समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। जल-थल में कई जातियाँ या तो गायब हो गई हैं या गायब होने की कगार पर हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि हाल के वर्षो में जिस तेजी से जलवायु परिवर्तन हो रहे हैं उतना तेजी से पिछले 10 हजार वर्षो में कभी नहीं हुआ। यही हाल रहा तो सन 2050 तक दुनिया का तापमान दो डिग्री बढ़ जाएगा।
जलवायु परिवर्तन से संक्रामक रोगों के मिजाज में भी बदलाव आया है। भारी बारिश, बाढ़, तूफान जैसे प्राकृतिक आपदाएं बढ़ी हैं। उष्ण कटिबंघीय क्षेत्र में तापमान बढ़ने से वर्षा के स्तर में भारी बदलाव के कारण खाद्यान्न उत्पादन में भारी कमी आ सकती है। इसका नतीजा कुपोषण व खाद्य असुरक्षा का प्रसार हो सकता है।