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Thursday, July 16, 2009

खतरे में अंटार्कटिक का अस्तित्व



वाशिंगटन। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता के मौजूदा स्तर में थोड़ी सी भी वृद्धि अंटार्कटिक की बर्फ चादर की स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।

"नेचर जर्नल" में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार एक अंतरराष्ट्रीय दल ने अपने अघ्ययन में पाया कि पिछली बार अंटार्कटिक में कार्बन डाइऑक्साइड की सान्द्रता का स्तर वर्तमान स्तर से बहुत अधिक था और उस समय बर्फ की चादर का एक विशाल हिस्सा पिघल गया था। उन्होंने अंटार्कटिक जियोलाजिकल ड्रिलिंग अनुसंधान के तहत पहली परियोजना के दौरान समुद्र सतह के नीचे "रास आइस शेल्फ" से 1280 मीटर लम्बी परत के परीक्षण के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है। अनुसंधान में न्यूजीलैंड, इटली, अमरीका और जर्मनी के 50 से अधिक वैज्ञानिकों ने भाग लिया और अघ्ययन का उद्देश्य पर्यावरण के कार्बन-डाइऑक्साइड सान्द्रण महासागरीय तापमान समुद्र के जल स्तर में बढ़ोतरी और पृथ्वी की कक्षा में प्राकृतिक चक्र से सम्बन्धित पूर्व के अघ्ययन निष्कर्ष में सुधार करना था। अनुसंधान दल के प्रमुख और वेलिंगटन स्थित विक्टोरिया विश्वविद्यालय में अंटार्कटिक अनुसन्धान केन्द्र के प्रोफेसर टिम नैश के अनुसार चट्टान और अवसादी परत से महत्वपूर्ण सूचना मिली है।

ऎसा लगता है कि अपने अक्ष पर पृथ्वी के झुकाव में बदलाव ने अंटार्कटिक महासागर की ऊष्मीयता ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इससे पश्चिम अंटार्कटिक की बर्फ की चादर के विकास चक्र में 30 लाख से 50 लाख साल पहले बदलाव आए थे।

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